Major Dhyan Chand Biography In Hindi | जिन्हें हिटलर ने दिया था ये ऑफर!

मेजर ध्यानचंद की कहानी: मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर (जन्म, परिवार, पत्नी, बेटा, शिक्षा) अन्तराष्ट्रीय खेल करियर और मृत्यु एवं कारण जाने पूरी जानकारी!

ये दास्तान हिंदुस्तान के एक ऐसे हुनरमंद की है, जिसने सारी दुनिया में मुल्क का नाम रौशन किया। इस महान शख्सियत के साथ ही हिंदुस्तान में होकि का सफर शुरू होता है। “मेजर ध्यानचंद” एक ऐसा नाम, जिस पर नाज करता है हिंदुस्तान। जिसको अपने फन का जादूगर कहा गया और होकि जिसके इशारों पर नाचती थी। हिंदुस्तान की हॉकी हमेशा मेजर ध्यानचंद की कर्जदार रहेगी।

मेजर ध्यानचंद जो रात-रात भर चाँद की रोशनी में अकेले मैदान में नगे पाऊ होकि खेलता था और जो देश के सम्मान और इज्जत के खातिर हिटलर से भी कह सकता था, में एक हिंदुस्तानी हु चांदी के सिक्को के खातिर वतन नहीं छोडूंगा। और उसी ध्यानचंद की विरासत को हम कितना सभाल के रख पाए है कितना जानते है हम Major Dhyan Chand की जिंदगी के संघर्ष और उनके समर्पण को! चलिए जानते है मेजर ध्यानचंद के जीवन की कहानी “Dhyan Chand biography in hindi” में।

मेजर ध्यानचंद जीवनी (Major Dhyan Chand Biography in Hindi)

उत्तरप्रदेश के इलाहबाद में रजमेंट के सूबेदार समेश्वर सिंह के परिवार में 29 अगस्त 1905 को एक बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया “ध्यान सिंह” इस ध्यान सिंह को दुनियाने होकि के जादूगर मेजर ध्यानचंद के रूप में जाना। ध्यान सिंह के दो भाई और तीन बहने थी सात-आठ साल के थे तो पिताजी को पहले विश्वयुद्ध में भेज दिए गए, बच्चों की पढाई अस्तव्यस्त हो गई।

माँ बच्चों को लेकर झाँसी आ गई ध्यान सिंह बचपन में ही हॉकी के खेल से आँखे लड़ा बैठे, दोस्तों और भाइयो के साथ पेड़ की डाल को तोड़कर होकि की स्टिक बना लेते और दिन भर खेलते। 12-13 साल में छठवीं कक्षा पास की और पढाई छोड़ दी। Major Dhyan Chand स्वाभाव से शर्मीले थे आसानी से किसी के साथ घुलते मिलते नहीं थे इस लिए किशोर होने तक ध्यानचंद का दोस्त था सूनापन। 

विश्व युद्ध के बाद पिताजी 1919 में लौटे तो बड़े परेशान हो गए, बिना पढाई के कहा काम मिलेगा और इसी उधेड़बून्द साल-दो-साल गुजर गए। इसी बिच रेजिमेंट में भर्ती होने लगी तो ध्यानचंद ने भी अपना आवेदन लगा दिया और उसे सिपाही की नौकरी मिल गई। दस-बारह रुपये की पहली वेतन मिली तो रातभर खुशी के मरे नींद ना आई अब दिन अच्छे कटने लगे। इसी बिच अक्षर ध्यानचंद रात को पास के मैदान में चले जाते और चांदनी रात में अकेले होकि खेला करते।

इसे भी पढ़े!

परिवार के लोग इस सनक से बहुत खुश नहीं थे लेकिन उन्होंने कभी उसे टोका भी नहीं क्यों की ध्यानचंद में और कोई ऐब नहीं था। ध्यानचंद की रेजिमेंट अच्छी होकि खेलने में मशहूर थी जब रेजिमेंट के सूबेदार बाले तिबारी ने देखा की ध्यानसिंह पेड़ से लकड़ी तोड़ कर उसकी होकि बनाकर खेलते है और उन्हें कोई खिलाडी रोक नहीं पाता तो वेह हैरान रह गए।  

बाले तिबारी खुद भी अच्छे खिलाडी और प्रशिक्षक थे उन्होंने ध्यानचंद को हॉकी सीखना शुरू कर दिया। ध्यान सिंह बाले तिबारी को अपना गुरु मानने लगे और एक दिन गुरूजी ने उनका नाम ही बदल दिया, वह बोले जिस तरह तुम चाँद की रौशनी में होकि खलते हो एक दिन तुम गगन में होकि के चाँद बनकर चमकोगे तुम्हारा नाम आज से “ध्यानचंद” है और उस दिन से ध्यानसिंग का नाम हो गया ध्यानचंद।

ध्यानचंद्र जन्म और परिवार (Dhyan Chand Family)

ध्यानचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के अलहाबाद में 29 अगस्त 1905 में हुआ था वे कुशवाहा मौर्य परिवार के थे उसके पिता का नाम समेश्वर सिंह था जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सूबेदार के रूप में कार्यरत थे, ध्यानचंद की माता का नाम शारदा सिंह था। ध्यानचंद के दो भाई थे मूल सिंह एवं रूप सिंह और वह दोनों ध्यानसिंह की तरह होकि खेला करते थे।

ध्यानचंद्र शिक्षा (Dhyan Chand Education)

इलहाबाद में ध्यानचंद के जन्म के कुछ समय बाद उनके पिता स्थानांतर झांसी में हो गया उसके बाद ध्यानचंद भी वही रहने लगे। पिता का बार-बार स्थानांतर होने के कारन वह पढाई में ध्यान अच्छी तरह नहीं लगा पाए और उनका मन होकि खेलने में लगा रहा वह केवल छठी कक्षा तक ही पढ़े है।

ध्यानचंद का शुरूआती करियर (Dhyan Chand Hockey Career)

एक छोटे से गाऊ में जन्मे ध्यानचंद एक साधारण सी शिक्षा प्राप्त करने के बाद मात्र 16 वर्ष की आयु में 1922 में भारतीय सेना में भर्ती हो गए। एक सधारण से सिपाही के हैशियत से ही वह भारतीय सेना में भर्ती हुए थे और उनके होकि के जादूगर बानने का सफर भी यही से शुरू होता है।

ध्यानचंद को होकि खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय उनके ही रेजिमेंट के एक सूबेदार मेजर बाले तिबारी को जाता है। मेजर तिबारी खुद भी एक हॉकी के खिलाडी थे और उनके ही देखरेख में ध्यानचंद होकि खेलने लगे और अपने कठिन परिश्रम और लगन के बल पर कुछ ही समय में वह दुनिया के महान होकि खिलाड़ी बन गए। 

ध्यानचंद अन्तराष्ट्रीय खेल करियर (Dhyan Chand International Goals)

दोस्तों अन्तराष्ट्रीय होकि मेचो में उन्होंने 400 से अधिक गोल किये और वह 1949 में रिटायर्ड हुए थे। लेकिन रिटायर्ड होने से पहले उन्होंने ऐसे ऐसे कारनामे किये जो पूरी दुनियाँ को हिला कर रख दिया, वर्ष 1928 में खेला गया ओलिंपिक में भारत ने पहली बार ओलिंपिक में भाग लिया था। और उस पुरे टूर्नामेंट में भारत एक भी मेच हारा ही नहीं था और फ़ाइनल में होलेंड को 3/0 से हरा कर गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा किया था।

भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में Major Dhyanchand की अहम् भूमिका थी फ़ाइनल में भी 3 में से 2 गॉल ध्यानचंद ही किये थे। उसके बाद आता है 1932 ओलिंपिक जो की लॉसएंजेल में खेला गया था इस ओलिंपिक में भारतीय होकि टीम ने गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा कर लिया था। फ़ाइनल मेच में अमेरिका को 24/1 के भारी अंतर से हरा दिया था। फिर बात आती है 1936 की जो बर्लिन में खेला गया और इस ओलिंपिक की आगेवानी Major Dhyan Chand कर रहे थे इस ओलिंपिक में भारतीय टीम ने गोल्ड मेडल जितने की हेट्रिक पूरी कर ली। भारतीय टीम ने जर्मनी को 8/1 के भारी अंतर से हरा दिया था।   

ध्यानचंद मृत्यु एवं कारण (Dhyan Chand Death)

1948 तक अन्तराष्ट्रीय होकी खेलते रहने के बाद 42 साल की उम्र में ध्यानचंद ने होकि से रिटायरमेंट ले ली उसके बाद ध्यानचंद के आखरी दिन कुछ अच्छे नहीं गुजर रहे थे उन्हें पैसो की भी कमी हो रही थी और हालत बहोत ही ख़राब चल रहे थे उसी दौरान उन्हें लीवर का कैंसर हो गया था जिसके चलते उन्हें दिल्ली के AIIMS हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था उसके बाद 3 डिसेम्बर 1979 को Major Dhyan Chand मृत्यु हो गई।

ध्यानचंद पुरस्कार (Dhyan Chand Award)

भारत सरकार द्वारा खेलों में जीवनभर की उपलब्धियों हेतु यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार का नाम भारत के नामी होकि खिलाड़ी “मेजर ध्यानचंद” के नाम से लिया गया है, जिन्हें होकि का जादूगर कहा जाता है। इस पुरस्कार की शुरुआत 2002 में हुई थी और इसकी पुरस्कार राशि 5 लाख रूपये होती है। इसमें पुरस्कार विजेताओं को Major Dhyan Chand की एक प्रतिमा, एक प्रमाण पत्र, औपचारिक पोशाक और 5 लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाता है जिसे बाद में बढाकर 10 लाख कर दिया गया।   

होमपेजयहाँ क्लिक करे!

प्रथम ध्यानचंद पुरस्कार विजेता

  • Shri Shahuraj Birajdar – Chess
  • Shri Ashok Diwan – Hockey
  • Smt. Aparna Ghosh – Basketball
Spread the love

Leave a Comment