मदर टेरेसा का जीवनी परिचय और उससे जुडी सुनी-अनसुनी बाते|About Mother Teresa in Hindi

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Mother Teresa Biography in Hindi – मदर टेरेसा का पूरा नाम, माता-पिता का नाम, नोबेल पुरस्कार, मृत्यु कब हुई और उसके जीवन की पूरी कहानी!

"मदर टेरेसा ने अपने देश में गरीब और बेसहाय लोगों की सेवा करने में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया। जब ऐसे महानुभाव को सम्मानित किया जाता है, तो अपने देश वासियों के लिए गर्व महसूस करना स्वाभाविक है" – प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी
“आपको क्या लगता है कि आज सबसे सफल महिला कौन है और क्यों? मदर टेरेसा, उसकी करुणा और प्यार और मुस्कान के साथ कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए ” – प्रियंका चोपड़ा

एक ऐसी सक्षियत जिसे देश का बच्चा-बच्चा पहजानता है, जिसे हम मदर टेरेसा के नाम से जानते है। जिसे बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें 1979 में मिला नोबेल शांति पुरस्कार भी शामिल है। आज हम उसी महान व्यक्तित्व (About Mother Teresa in Hindi) के जीवनके बारे में बात करेंगे।

19 अक्टूबर 2003 को मदर टेरेसा को “कलकत्ता की भाग्यवान टेरेसा” की उपाधि भी दी गयी थी। इसके बाद दिसम्बर 2015 में पॉप फ्रांसिस ने के रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा उन्हें “संत” की उपाधि दी गयी थी। संत बनने की उनकी विधि 4 सितम्बर 2016 को हुई थी।

मदर टेरेसा का पूरा नाम, माता-पिता और मृत्यु कब हुई  (About Mother Teresa in Hindi)

नाम – मदर टेरेसा

जन्म – 26 अगस्त, 1910

जन्म स्थल – युगोस्लाविया के एक गाँव में

मृत्यु – 5 सितंबर 1997

शैक्षिक योग्यता – आयरलैंड के राथफर्नहम में लोरेटो एबे में अंग्रेजी सीखी

पिता का नाम – निकोल्ले

माता का नाम – द्रनाफिले बोंजशियु

मदर टेरेसा की कहानी (Story of Mother Teresa)

मदर टेरेसा का जन्म अग्नेसे गोंकशी बोंजशियु के नाम से 26 अगस्त 1910 को कोसोवर अल्बेनियन् परिवार में हुआ था। लेकिन 27 अगस्त को उनका वास्तविक जन्मदिन माना जाता है।

उनकी जन्मभूमि स्कोप्जे आज रिपब्लिक ऑफ़ मकदूनिया की राजधानी है, उनके जन्म के समय यह ओटोमन साम्राज्य का ही एक भाग था।

निकोल्ले और द्रनाफिले बोंजशियु की सभी संतानों में मदर टेरेसा सबसे छोटी थी। उनके पिता मकदूनिया की अल्बेनियन् कम्युनिटी जैसी राजनितिक पार्टी के सदस्य थे जिनकी मृत्यु 1919 में हुई थी, उस समु मदर टेरेसा केवल 8 साल की ही थी।

वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।बचपन में ही वह भारत, बंगाल में चल रही मिशनरी सेवाओं के प्रति मोहित हो गई थीं।

उन्होंने अगनेस गोंझा बोयाजिजू के रूप में अपना धर्म परिवर्तन किया।

माना जाता है कि इस दुनिया में लगभग सभी लोग सिर्फ अपने लिए जीते हैं पर इतिहास में ऐसे कई मनुष्यों का उदहारण नहीं हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में व्यतीत कर दिया हो। मदर टेरेसा एक ऐसी महान सख्शियत हैं जो अपना पूरा जीवन सिर्फ दूसरों के लिए जिया हैं।

मदर टेरेसा ऐसा नाम है जिसका स्मरण होते ही हमारा ह्रदय श्रध्धा से भर उठता है और चेहरे पर एक ख़ास आभा उमड़ जाती है।

मदर टेरेसा एक ऐसी महान आत्मा थीं जिनका ह्रदय संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए धड़कता था और इसी कारण उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनके सेवा और भलाई में लगा दिया।

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मदर टेरेसा ने घर कब छोड़ा था और फिर वो कहाँ गई? (Mother Teresa Biography in Hindi)

सन 1928 में महज 18 साल की उम्र में उन्होंने लोरेटो बहनों के साथ रहने के लिये घर छोड़ दिया था, वही पर मदर टेरेसा इंग्लिश भी सीखती थी और ईसाई धर्म प्रचारक बनने की राह में पहला कदम रख दिया था। लोरेटो बहाने भारत में बच्चो को पढ़ाने के लिये इंग्लिश भाषा का उपयोग करते थे।

घर से निकालने के बाद उन्होंने दोबारा कभी अपनी बहनों और अपनी माँ को नही देखा था। 1934 तक उनका परिवार स्कोप्जे में ही रहता था और इसके बाद वे अल्बानिया के टिराना में चले गए थे।

इसके बाद साल 1929 में मदर टेरेसा भारत में आई और दार्जिलिंग में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की, वही हिमालय की खूबसूरत पहाडियों के पास सेंट टेरेसा स्कूल में वे बंगाली सीखी और वहाँ बच्चो को पढ़ाती थी 24 मई 1931 को उन्हें पहली बार सन्यासिनी की पदवी मिली थी। और इसके बाद उन्होंने अपना मूल नाम बदलकर टेरेसा ही रख दिया था।

14 मई 1937 से मदर टेरेसा लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाती थी। टेरेसा ने अपनी जिंदगी के तक़रीबन 20 साल वही बिताये और 1944 में उनकी नियुक्ति हेडमिस्ट्रेस के पद पर की गयी थी।

1942 में बंगाल के कुछ हिस्सों में जब अकाल पड़ा तो उससे प्रभावित लोगो की सेवा के साथ-साथ युद्ध में घायल लोगों की सेवा कार्य भी किया |

मदर टेरेसा को बच्चो को स्कूल में पढ़ाने का काफी शौक था, लेकिन कलकत्ता में अपने जीवन और आस-पास फैली गरीबी से वे काफी चिंतित थी इस दौरान कई बार उनके शहर में हिंसक घटनाये भी हुई थी।

मदर टेरेसा के अनसुने किस्से (Inspiration of Mother Teresa in Hindi)

मदर टेरेसा की विशेषता यह थी कि उन्होने विदेश में जन्म लिया परंतु कार्य भारत में किया। वे यूगोस्लाविया की रहनेवाली थी, परंतु उन्होने भारत को ही अपना घर बना लिया।

ईसाई धर्मप्रचारक के रूप में उन्होने सफलता पाई और उन्होने सेवा कार्य जो भारत से आरंभ किया वह विश्व के सौ से भी अधिक देशों में फैल गया।

उन्होने बहुत समय तक लगातार निर्धनों, भयंकर कष्ट से पीड़ित बीमार लोगों की सेवा की। वे 24 घंटे मिशनरीज़ ऑफ चॅरिटी के कार्यों में लगी रहती थी।

1. एक बार बहुत देर हो जाने पर उनकीसहायक नर्स ने पूछा कि वे और कितनी देर तक कार्य करेंगी, क्योंकि घड़ी की सूइयां रात के 12 बजा रही थी।

उनका उत्तर था, जब तक ग़रीबों और निर्धनों के कष्ट दूर नहीं हो जाते, तब तक हमें यह कार्य करते रहना होगा और यदि चाँद सितारों में भी निर्धन और असहाय लोग है तो हमें वहाँ जाकर भी उनकी सेवा का कार्य करना होगा।

2. 1946 में वे रेलगाड़ी में बैठकर कहीं जा रही थी तो उन्होने जो द्रुश्य देखे उसके बाद उन्होने अनुभव किया कि उनका असली कार्य दरिद्रनारायण की सेवा करना तथा उनके साथ उनकी तरह रहना ही है   .

1950 में कलकत्ता में उन्होने मिशनरीज़ ऑफ चॅरिटी की स्थापना की और उसका कार्य करने लगी। उन्होने कलकत्ता में ऐसे अनेक द्रुश्य देखे जिन्हे देखकर मानवता कराह उठती है।

उन दिनों कलकत्ता के एक सिनेमा हाउस के सामने कूड़े-कचरे से भारी एक नाली थी। उसमे पत्ते, दोने, चिथड़े और झूठन तथा कीचड़ भरी थी। सुअर और कुत्ते उसे कुरेड कर उसमे खाने में चीज़ें ढूँढ रहे थे।

एकाएक कुछ पत्ते हीले और पास खड़े आदमियों ने देखा कि एक बच्चा हाथ-पाँव हिला रहा है। उन्होने बच्चे को लावारिस समझ अस्पताल या अनाथालय में दाखिल करने की सोची।

एक आदमी उसे उठाकर चला ही था कि एक भिखारिन भागती हुई आई और चिल्लाकर उस आदमी से बोली, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बच्चे को उठाने की?”

“तुम्हारा है यह बच्चा?”

“हाँ”

“तो तुमने यहाँ नाली में क्यों डाल रखा था?”

भिखारिन ने बताया कि उसके पास कुल डेढ़ गज की धोती है, यदि उसमे से कपड़ा फाड़ती हूँ तो मेरा शरीर नंगा होता है, जिसे में पहले ही पूरी तरह से नहीं ढांप पाती। इसलिए बच्चे को नाली में सुलाकर भीख माँग रही थी।

3. प्रारंभ में जब ‘मदर’ कलकत्ता के लारेटो स्कूल में काम करती थी तब वे स्कूल की बस में बैठ कर अपने डेरे पर जाती तो उन्हे इस प्रकार के द्रुश्य देखने को मिलते।

लारेटो के काम से ही जब एक बार वे गाड़ी से दार्जिलिंग जा रही थी तब उन्होने लारेटो छोड़कर इन ग़रीबों के लिए काम करने का निश्चय किया।

उस समय उनके पास अपना कार्य चलाने के लिए केवल तीन साड़ियाँ और पाँच रुपये थे।

4. कलकत्ता में जहाँ उन्होने अत्यंत निर्धनता में जीवन बिताने वाली महिलाओं, वृद्ध पुरुषों और बच्चो को देखा था और उनके लिए कार्य प्रारंभ किए थे, इसके अतिरिक्त सड़कों पर पड़े हुए कोढ़ग्रस्त लोगों की दुर्दशा भी देखी थी।

उन्होने उन्हे समझाया कि इस रोग से बचने के उपाय भी है और अच्छी तरह देखभाल करने से रोग में सुधार हो सकता है।

उन्होने टीटागढ़ में महात्मा गाँधी कुष्ठ आश्रम की स्थापना की।  उन्होने ऐसे अनेक रोगियों को अपने हाथों से उठाकर इस आश्रम में पहुँचाया।

उन्होने इस प्रकार के रोगियों की सहायता की थी जिन्हे वस्तुत: समाज ने बिल्कुल व्यर्थ समझकर कूड़े के ढेर पर डाल दिया था।

जब 1979 में उनके इस प्रकार के कार्यों के लिए उन्हे शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया तो उन्होने अपने वक्तव्यों में गर्भपात करने वालों को ‘हत्यारा’ कहा था।

5. उन्होने अपना कार्य केवल 5 रुपये से प्रारंभ किया परंतु कार्य का विस्तार होने और 125 देशों में साढ़े सात सौ से अधिक केंद्रों की स्थापना के बाद भी उनके कार्य का प्रमुख स्थान कलकत्ता में एक छोटा सा कार्यालय ही रहा, जहाँ से वे अपना कार्य चलाती थी।

मिशनरीज़ ऑफ चॅरिटी के इन केंद्रों में प्रति दिन पाँच लाख से अधिक भूखे लोगों के लिए खाना जुटाया जाता था।

ढाई लाख से अधिक रोगियों को दवा दी जाती थी और 20 हज़ार से अधिक गंदी बस्तियों में रहने वाले बच्चों को शिक्षित करने का प्रयत्न किया जाता था।

इसके अतिरिक्त उनकी सेवा का विस्तार एड्स से पीड़ित बीमारों, नशे का सेवन करने के कारण अपना जीवन नष्ट करनेवालों तक फैला हुआ था। बच्चों तथा क्षय रोग से पीड़ित लोगों की सेवा का कार्य भी उन्होने संभाल रखा था।

6. मदर टेरेसा ने जिस प्रकार अपने सेवा कार्य का विस्तार किया और जिस प्रकार दिन-रात वे सेवा के कार्यों में लगी रहती थी, बहुत से लोग यह संदेह करने लगते थे कि उनके बाद यह कार्य कहीं समाप्त न हो जाए।

परंतु उनका कहना था कि यह कार्य भगवान के निमित्त है और उसी को समर्पित है , इसलिए इसके समाप्त होने का कोई भय नही।

वे जहाँ कहीं भी जातीं बड़े-बड़े राजा-महाराजा और राष्ट्रपति उनके सम्मान में पालक-पाँवडे बिछा देते थे।

उनका उत्तर था कि मैं किसी से कुछ माँगती नहीं, सरकारों से भी किसी प्रकार के अनुदान की याचना नहीं करती।

मैं किसी प्रकार की सेवा के लिए वेतन के रूप में कुछ नहीं लेती, लोग स्वयं अपनी इच्छा से पैसा देते है।

उन पर कुछ लोगों ने इस बात का आरोप भी लगाया कि वे निर्धन लोगों के धर्मपरिवर्तन का कारण बनती है।

उनका उत्तर था कि मेरा त प्रयत्न केवल यही है कि एक हिंदू अच्छा हिंदू बने।

मदर का मानना था कि भूखे लोगों की रोटी में ईश्वर के दर्शन होते है। गंदी बस्तियों में रहने वाले पीड़ित लोगों में उसका साक्षात रूप दिखाई देता है।

उनका कहना था कि सड़क पर भूख से, बीमारी से, दुर्घटनाओं से अंग-भंग होकर मरने वाले लोगों और शूली पर चढ़े हुए ईसा में उन्हे कोई अंतर नही दिखाई देता।

मदर टेरेसा को नोबेल पुरस्कार कब मिला (मदर टेरेसा को मिले हुए पुरस्कार)

लारेटो में उनके साथ काम करनेवाली एक विदेशी महिला का कहना था कि मदर प्रारंभ में बिल्कुल सीधी-सादी थी।

उनमें कोई विशेषता नज़र नही आती थी और हम इस बात के लिए कभी सोच भी नहीं सकते थे की उनके कार्य की सीमा का यहाँ तक विस्तार होगा।

मदर टेरेसा नीले किनारे की बहुत सादी-सी धोती में रहती थी। किसी प्रकार का आडंबर न तो उनके पहनावे से प्रकट होता था और न उनके ख़ान-पान से। उनके अनेक कार्यों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उन्हे भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ के अतिरिक्त अन्य अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए परंतु वह अपना सबसे बड़ा सम्मान निर्धानों, अपाहिजों की सेवा में मानती थी।

इस प्रकार उनका यह सेवा कार्य प्रारंभ से लेकर अंत तक प्रभु को समर्पित था। उनके स्थान पर अब “निर्मला देवी” इस महान सेवा कार्य की देखभाल और संचालन कर रही है।

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अंतिम शब्द!

में आशा करता हु की आप लोगो को about mother teresa in hindi जो एक ऐसी सक्षियत हे जिन्होंने पुरे विश्व में अपने सेवा भावी कार्यो से नाम रोशन किया और जिन्हे कई सारे नोबल पुरष्कारो से सन्मानित किया गया। ऐसे महानुभाव के बारे में पूरी कहानी जानकर अच्छा लगा होगा और कुछ अच्छी बाटे सिखने को भी मिली होगी धन्यवाद्।

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